छत्तीसगढ़

रायगढ़ विधायक आरोपों के घेरे में

10 करोड़ का वारा न्यारा, निगम आयुक्त की संदेहास्पद भूमिका

जिला प्रशासन की नीति व नीयत पर उठने लगे सवाल

दिनेश मिश्र – नगर निगम में हुए 10 करोड की लागत से निर्मित शौचालय घोटाले में बड़ी संख्या में रायगढ विधायक के करीबी लोगों का नाम सामने आने के कारण विधायक आरोपों के केंद्र में आ गए हैं। अब तक जिन लोगों पर घोटाला करने के प्रामाणिक आरोप लगे हैं उसमें सबसे बड़े घपलेबाज संजय अग्रवाल को विधायक का करीबी बताया जा रहा है,

जबकि दूसरे बड़े घोटालेबाज जयकिशन अग्रवाल उर्फ “जैकी” का नाम प्रदेश भाजपा के महामंत्री गिरधर गुप्ता से जुड़ा हुआ है। संत माइकल स्कूल में एक साथ 15 शौचालय निर्माण की गड़बड़ी में लिप्त ठेकेदार *राजेश उर्फ राजू गुप्ता भी विधायक खेंमे से जुड़ा हुआ है। भाजपा की टिकट से पार्षद चुनाव लड़ने वाला यह व्यक्ति नगर भाजपा का पदाधिकारी बताया जा रहा है

इसके अतिरिक्त शौचालय निर्माण का बड़ा ठेका पाने वालों में *जिला भाजयुमो अध्यक्ष विकास केडिया व ठेकेदार सूरज जायसवाल(आत्मज- राजकुमार जायसवाल) को भी विधायक का नजदीकी माना जाता है। आरोप है कि राजनैतिक दबाव के कारण ईनके कामों की जांच नही की जा रही है अन्यथा और बड़े घोटाले के सामने आने की संभावना हैं। यह बात भी सामने आई है कि दूसरों के रजिस्ट्रेशन पर इस ठेके से मोटी कमाई करने वालो में भाजपा के एल्डरमेन ,भाजपा संगठन के छोटे -बड़े पदाधिकारी व आर.एस.एस के लोग एवं कतिपय फूल छाप कांग्रेसी भी शामिल हैं।

विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अपने कार्यकर्ताओं व फूल छाप कांग्रेसियो को उपकृत करने तथा वोट बैंक की राजनीति को साधने के उद्देश्य से शौचालय निर्माण के कार्य को इन लोगों के बीच बाँटा गया है। सूत्र बताते है कि इस आबंटन हेतु विधायक के सबसे विश्वस्त सिपहसलार को नियुक्त किया गया था। चूँकि ईतने बड़े काम का ठेका सार्वजनिक निविदा की बजाय केवल साधारण आवेदन के द्वारा किया जाना था, अतः मौके का फायदा उठाकर “अँधा बाटे रेवड़ी चिन्ह -चिन्ह के देय”* की तर्ज पर 10 करोड़ के शौचालय निर्माण का काम बांट दिया गया।

इस तरह मोदी सरकार की बहुप्रतीक्षित *स्वच्छ भारत योजना* के तहत रायगढ़ शहर में गरीब आदिवासी व दलित वर्ग के लिए बनाया जाने वाला शौचालय निर्माण कार्य विधानसभा चुनाव जीतने की अतिरेकपूर्ण लिप्सा के कारण भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। मीडिया की सक्रियता के कारण उजागर हुए इस घोटाले को दबाने के लिए जो चालबाजियां की जा रही है उससे शहर में हो रही मिली जुली व्यावसायिक राजनीति का कुरूप चेहरा खुलकर सामने आ गया है। चालाकी पूर्ण ढंग से सर्वदलीय पार्षदों की सात सदस्यीय जांच कमेटी बना दी गई। सोचे समझे ढंग से इस जांच समिति की गति को धीमा किया गया। इसके दायरे को घटाकर केवल प्राप्त शिकायतों तक ही सीमित कर दिया गया।

जांच के दायरे में राजनैतिक दल से सीधे तौर पर जुड़े हुए ठेकेदारों को शामिल नही किया गया तथा निगम की इस जाँच रिपोर्ट में निगम आयुक्त व संबंधित अधिकारियों पर कार्यवाही की अनुशंसा भी नही की गई। इस पूरे मामले में निगम आयुक्त की भूमिका संदेहास्पद मानी जा रही थी। अंततः जांच को जिला प्रशासन ने अपने हाथ में ले लिया किंतु कई माह गुजर जाने के बावजूद अभी तक जाँच रिपोर्ट का अता-पता नहीं है।

शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु आयोजित बैठकों में बात -बात पर फटकार लगाने वाली जिला कलेक्टर शम्मी आबिदी ने भी शौचालय घोटाले के मामले में अब तक न केवल चुप्पी साध रखी है वरन अलग-अलग बहाने से जांच को लम्बा खींचकर दोषियों को लीपापोती हेतु पर्याप्त अवसर दिया जा रहा है। *खबर है कि आज केवल दो वार्डों की अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत हुई है। जबकि भाजपाई ठेकेदारों द्वारा जिन वार्डों में काम किया गया है उसकी जाँच की ही नहीं गई है। जिला प्रशासन की इस संदेहास्पद कार्यप्रणाली के कारण उसकी नीति व नियत को लेकर आम जनता का अविश्वास बहुत बढ़ गया है।

अधिकारी, नेता व व्यापारियों का नापाक गठजोड़ क्या निर्बाध गति से सरकारी पैसों का बंदरबांट करके पूरे सिस्टम को खोखला कर देगा और क्या गरीब वर्ग के लिए बनाई जाने वाली योजनाएं इस भ्रष्ट कार्यप्रणाली के कारण बीच रास्ते मे ही दम तोड़ देगी ? यह प्रश्न पूछने वाला मीडिया के अतिरिक्त कोई दूजा नही बचा। बड़े नेता बड़े कामो में करोड़ो अरबो का वारा न्यारा कर रहे हैं और मध्यमवर्गीय छूटभैये नेताओं का लंपट वर्ग इस तरह के घोटालों से माल हड़पकर बड़े नेताओं के जय-जयकार में अपना जीवन खपा रहा है। इन सबके बीच बेबस और लाचार गरीब जनता अपने लुट जाने का चुपचाप तमाशा देख रही है।

यही है रायगढ़ की लूटमार भरी राजनीति का कड़वा सच।

पत्रिका अखबार में नगर निगम क्षेत्र में टॉयलेट निर्माण करने वाले प्रमुख ठेकेदारों के नाम और उनके द्वारा निर्मीत टॉयलेट की संख्या प्रकाशित हुई थी।

योजना अनुसार ठेकेदार को प्रति टॉयलेट 18 हजार रुपये का भुगतान होना था। इस आधार पर ठेकेदारों को भुगतान की राशि की गणना करने पर आंखें फटी रह जाती है।

सूची प्रस्तुत है।

1. *संजय अग्रवाल* ( 1133 टॉयलेट)- 2करोड़ 3 लाख 94 हजार रुपये।

2. *जयकिशन अग्रवाल* ( 827 टॉयलेट) – 1 करोड़ 48 लाख 86 हजार रुपये।

3. फास्ट ट्रैक निर्माण एजेंसी- कौशल अग्रवाल ( 539 टॉयलेट) -: 97 लाख 2 हजार रुपये

4. एस.आर.कंपनी – नितेश पांडेय, सौरभ अग्रवाल, राकेश ( 421 टॉयलेट) :- 75 लाख 78 हजार रुपये।

5. अजय शर्मा फर्म ( 328 टॉयलेट) :- 59 लाख 4 हजार रुपये।

6. विराट कंस्ट्रक्शन -रितेश अग्रवाल, *विकास केड़िया* ( 318 टॉयलेट ) :- 57 लाख 24 हजार रुपये।

7. जनचेमन फर्म- मुक्ति मेहर ( 295 टॉयलेट) :- 53 लाख 10 हजार रुपये।

8. सोसायटी ऑफ पीपुल्स वेलफेयर – मुकेश कुमार सिंह , बरमकेला ( 265 टॉयलेट ) :- 47 लाख 70 हजार रुपये।

9. फिरत जायसवाल फर्म ( 299 टॉयलेट ) :- 53 लाख 82 हजार रुपये।

10. रितेश पांडेय फर्म ( 236 टॉयलेट ) :- 42 लाख 48 हजार रुपये।

11. *राजेश गुप्ता* फर्म ( 223 टॉयलेट ) :- 40 लाख 14 हजार रुपये।

12. विजय सिंघानिया फर्म ( 175 टॉयलेट ) :- 31 लाख 50 हजार रुपये ।

13. अनिल डालमिया फर्म ( 159 टॉयलेट ) :- 28 लाख 62 हजार रुपये।

14. प्रदीप मिश्रा फर्म ( 153 टॉयलेट ) :- 27 लाख 54 हजार रुपये।

15. सूरज जायसवाल फर्म ( 111 टॉयलेट ) :- 19 लाख 98 हजार रुपये।

16. अली अशरफ फर्म ( 100 टॉयलेट ) – 18 लाख रुपये ।

स्पष्ट है एक-एक ठेकेदार को लाखों और करोड़ों में भुगतान किया गया है।
*उल्लेखनीय है कि इस बीच एक प्रमुख भाजपा पदाधिकारी ने आरोपी फर्म से अपनी पार्टनरशिप हटा ली है।* इधर कुछ आरोपियों ने लीपापोती हेतु कुछ बकाया निर्माण भी कर लिया है।

प्रश्न यह है कि क्या वास्तविक दोषी पकड़ में आयेंगे ?

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