संपादकीय

पैसा नहीं खाने का प्रचार बनाम काली कमाई

दिनेश मिश्र – विचारधारा की राजनीति का पूरी तरह से सफाया हो जाने के बाद अब सत्ता की राजनीति में दो वर्ग बेहद प्रभावशाली हो गये हैं। एक है सत्ता की ताकत का दोहन करके अकूत धन संपत्ति हासिल करने वाले व्यावसायिक नेताओं का शक्तिशाली वर्ग और दूसरा है इनके साथ जुड़कर “मक्खन -मलाई” व “चटनी-चूरन” का जुगाड़ करने वाला दास वर्ग (दलाल वर्ग)। इस दलाल वर्ग में कुछ “थिंक टैंक नुमा” लोग भी होते हैं। ये षड्यंत्रकारी लोग अपने नेता के कुकर्मों को छिपाने हेतु तरह-तरह के ‘स्लोगन’ व ‘सूत्र वाक्य’ गढ़कर माउथ कैंनवासिंग व सोशल मीडिया कैम्पेनिंग आदि के द्वारा उन्हें स्थापित करने का षड्यंत्र रचते रहते हैं तथा आमजन की आलोचनाओं से नेता जी को उबारकर उसकी छवि को बचाने के लिये बेहद शातिराना ढंग से लोकप्रिय तर्क भी स्थापित करते रहते हैं। जैसे कि :- बद्तमीजी को खरापन बताना, असंतुलित व्यवहार को तेजतर्रारी निरूपित करना आदि।

चुनाव को नजदीक देखकर इन दिनों यह दास वर्ग (दलाल वर्ग) बहुत सक्रिय हो गया है। आपको यह बात कई स्रोतों से सुनने को मिलेगी कि
” भैया के बारे में कोई कुछ भी कहे लेकिन उनकी ईमानदारी पर कोई उंगली नहीं उठा सकता है। आज तक काम करवाने के एवज में किसी से कोई पैसा नहीं लिया है उन्होंने ।”

इसी से जुड़ी दूसरी चर्चा यह सुनेंगे कि
“व्यापार करके के कमाना गलत बात नहीं है। राजनीति अपनी जगह है – व्यापार अपनी जगह।”

ऊपरी तौर ठीक लगने वाली यह चर्चा दरअसल सत्ता की ताकत पर “भ्रष्ट व्यापार” के जरिये नेता जी द्वारा हासिल की गयी काली कमाई की ओर से आम लोगों का ध्यान हटाने की सोची-समझी राजनैतिक साजिश है।

रायगढ़ जैसे औद्योगिक नगर में व्यापार जानने वाले छोटे से छोटे नेता को जनता का काम करवाकर पैसा खाने की जरूरत ही नहीं है। मुद्दा तो यह है कि आम जनता दो जून की रोटी के लिये संघर्ष कर रही है।प्रशासनिक व औद्योगिक मनमानी का शिकार होकर क्षेत्र के किसान व गरीब लोग जल-जंगल व जमीन से बेदखल हो रहे हैं। जबकि सत्ता की कुर्सी मिलते ही नेतागण इन्हीं संस्थानों में सप्लाई व ठेका कार्य लेकर करोड़पति हो रहे हैं। औने- पौने बेनामी जमीन लेकर गलत खाता बंटवारा के द्वारा अधिग्रहण में भारी मुआवजा झटक रहे हैं।

लोग अपनी जमीन के मुआवजे, व्यवस्थापन और जमीन के बदले नौकरी की मांग को लेकर सड़कों पर हैं और नेता जी न केवल खामोशी की चादर ओढ़ लेते वरन इस जनदबाव को अनदेखा करने के एवज में नेशनल हाईवे का मार्ग परिवर्तित करवाकर स्वयं करोड़ों का मुआवजा हासिल कर लेते हैं। जिनकी जमीनें गयी हैं उन्हें भले ही नौकरी नहीं मिले लेकिन नेताओं के नाते-रिश्तेदार नौकरी में अवश्य घुसा दिये जाते हैं।

शासकीय योजनाओं के बड़े ठेकों में पर्दे के पीछे नेताओं की भागीदारी हो जाती है जबकि मध्यम व छोटे कामों में इनके चेला-चपाटी एडजस्ट हो रहे हैं तथा नंगे भ्रष्टाचार के जरिये अपनी जेबें भर रहे हैं। मीडिया व विपक्ष द्वारा घोटाले उजागर किये जाने पर नेता जी अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके उन्हें बचा लेते हैं। कभी-कभी बाहुबल का प्रदर्शन करके पत्रकार की आवाज भी दबाई जाती है।

इन सबके बावजूद तुर्रा यह कि भैया जी ईमानदार है।

ईमानदारी के वटवृक्ष जी भ्रष्टाचार की लतायें चारों तरफ से लिपटी हुई हैं। जनता सब देख-समझ रही है। अतः सूत्र वाक्यों द्वारा ईमानदारी का मौखिक प्रचार अब काम नहीं आने वाला है।

चलते-चलते :- आम लोगों के बीच पराजय सुनिश्चित होने की चर्चा जोरों पर है। यदि कोई दूत आपसे यह कहे कि इस बार 40-50 से जीत सुनिश्चित है तो वास्तव में यह चर्चा का रूख मोड़ने की थिंकटैंकनुमा कोशिश है।

वे चाहते हैं कि पराजय की चर्चा को बदल दें और जीत का इतना बड़ा दावा कर दें कि पूरी चर्चा जीत के मार्जिन पर केंद्रित हो जाये।*

सावधान रहें, सतर्क रहें, सुरक्षित रहें !

Tags

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close