छत्तीसगढ़लेख

कमल अब मुरझाने लगे हैं, अब तो इस तालाब का पानी बदल डालो !

दिनेश मिश्र/रायगढ़ – सत्ता सुंदरी का स्वयंबर इसी वर्ष नवंबर माह में संभावित है। इसी सिलसिले में राजा रमन सिंह जी की पालकी 28 मई को रायगढ़ विधानसभा में पधार रही है। स्वयंबर में उम्मीदवारी की पात्रता पाकर दूल्हा बनने को आतुर सभी शूरवीर महामहिम राजा जी के समक्ष अपने भुजदंडों का सामर्थ्य व अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करने हेतु जमीन-आसमान एक किये हुये हैं। विगत 15 वर्षों से हाशिये पर डाल दिये गए कार्यकर्ताओं का मान मनौव्वल किया जा रहा है। राजा साहब की अगुवानी में शहर को सजाने में जिम्मेदारी व खर्च उठाने हेतु हेतु संभावित उम्मीदवार बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं। समर्थक धनकुबेरों को जगह-जगह वंदनवार व ढोल-नगाड़ों की के प्रबंध में लगा दिया गया है। शहर भर में बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाकर स्वयंबर में अपनी उम्मीदवारी प्रकट करने की होड़ मची हुई है।

आओ राजा जी बैठो, हमने खाल उतारी है :- पुराने अनुभवों के कारण माना जा रहा है कि व्यापक तैयारी,प्रशासन के दबाव तथा पैसे,प्रलोभन व सत्ता की चकाचौंध से प्रभावित होकर क्षेत्र की लूटी-पिटी जनता “आओ राजा जी बैठो हमने खाल उतारी है ” की तर्ज पर बड़ी संख्या में पुनः जुट जायेगी। अगले दिन इस पूरी उठा-पटक को मीडिया के माध्यम से भाजपा सरकार के प्रति जनता में अपार उत्साह का नाम देकर चौथी बार विजय सुनिश्चित होने का दावा कर दिया जायेगा। अंत में राजा रमन सिंह ने अमुक उम्मीदवार की प्रशंसा की, अमुक की पीठ थपथपाई, अमुक का कद बढ़ा और अमुक को कोई भाव नहीं दिया गया, इस तरह की चर्चा से सोशल मीडिया गंधाने लगेगा और प्रहसन पूर्णता को प्राप्त हो जायेगा।

इस दौरान बुकलेट , पाम्पलेट और आमसभा के भाषण में विगत साढ़े चौदह वर्षों में भाजपा सरकार द्वारा किये गये कार्यों को ऐतिहासिक विकास बतलाया जायेगा। “सबके साथ-सबका विकास” की डींगें हाँकते हुये यह दावा किया जायेगा कि पिछली कांग्रेस सरकार ने इन्हें विरासत के रूप में जो ‘नरक’ सौंपा था उसे इन्होंने अपने पुरुषार्थ से ‘जन्नत’ बना दिया है।

थैलीशाहों के हाथों लुट गया विकास :- डॉ. साहब आपका दावा अपनी जगह है लेकिन अब रायगढ़ की जनता इन दावों को सत्तारूढ़ दल का झूठ और पाखंड मानने लगी है। शायद आपको मालूम नहीं हो कि रायगढ़ में सत्ता का अंदुरुनी ढाँचा भाजपा व कांग्रेस के बड़े व्यावसायियों की मिली-जुली कंपनी में तब्दील हो चुका है। विगत साढ़े चौदह वर्षों में इस मिली-जुली कंपनी के थैली शाहों ने सरकारी खजाने को जमकर लुटा-खसोटा है। रायगढ़ में नये नेतृत्वकर्ता के पिछले साढ़े चार वर्षों के कार्यकाल में यह खूँखार गठबंधन और अधिक मजबूत हुआ है।

अधिकांश सरकारी ठेके भाजपाइयों व फूल छाप कांग्रेसियों ने मिल-जुल कर हथिया लिये। आप निर्माण कार्यों में अरबों खर्च करने का ढिंढोरा तो पीट सकते हैं लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि आपके जनप्रतिनिधियों, उनके रिश्ते-नातेदारों, पार्टी-पदाधिकारियों और सरकारी अमले द्वारा किये गये भारी भ्रष्टाचार, लेटलतीफी और घपले-घोटालों के कारण गुणवत्ताविहीन एवं अधूरे निर्माण कार्यों की एक बेतरतीब श्रृंखला खड़ी हो गयी जिसने इस क्षेत्र की तस्वीर को बदसूरत बना कर रख दिया है।

इस नये दौर में सड़के आज बनी और महीने भर बाद उखड़ गयी। खस्ता हाल गौरवपथ, दरकते अटल आवास व वाल्मीकि आवास, जगह-जगह से दरारयुक्त नावनिर्मित सामुदायिक भवन, सरकारी दुकानें व भवन, हाट-बाजार एवं छोटे-बड़े पुल-पुलियों की दुर्दशा भाजपाइयों के भ्र्ष्टाचार की जिंदा मिसालें है। डस्टबिन खरीदी घोटाला, बारदाना खरीदी घोटाला, पाखड़ चावल घोटाला कस्टम मिलिंग घोटाला आदि भाजपाइयों द्वारा एक ही निवाले में सब कुछ हजम कर लेने की कोशिशों का परिणाम है। इन सभी घोटालों सहित हाल ही में नगरनिगम में सामने आये ‘टॉयलेट घोटाले’ एवं ‘बड़माल’ में हुये रेत तस्करी कांड आदि में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से स्थानीय नेतृत्व का नाम जुड़ा होने के कारण भाजपा की बहुत किरकिरी हुई है।

केलोबाँध की नहरों का अधूरा निर्माण, अधूरा मेडिकल कॉलेज, खंडहर होता हुआ अधूरा सांस्कृतिक भवन, नकारा सिद्ध हो चुकी अधूरी पेयजल आवर्धन योजना, पच्चीस सड़कों का अधूरा निर्माण, किवदंती बन चुकी रायगढ़-सराईपाली सड़क, फोरलेन की बाँट जोहती रायगढ़-जशपुर डेथ जोन की सड़क व रिंग रोड, प्रस्तावित कोडातराई एयरपोर्ट, चक्रधरनगर और कोतरारोड का प्रस्तावित ओवरब्रिज, अन्तर्राज्यीय बस स्टैंड आदि स्थानीय नेतृत्व की असफलता व भाजपाइयों की लचर कार्यशैली के जीते-जागते उदाहरण हैं।

औद्योगिकरण की त्रासदी और बेबस जनता :- हमारे क्षेत्र में औद्योगिकरण के नाम पर शुरू हुई अंधी लूट भाजपा शासनकाल में नग्न रूप में सामने आयी है। भाजपा सरकार ने उद्योगपतियों व इजारेदारों को यहां के गरीबों व आदिवासियों की बेशकीमती जमीनों, खनिज, जलसंसाधन एवं प्राकृतिक संपदाओं को लूटकर अपन खजाना भरने तथा प्रदूषण फैलाने एवं खेत-खलिहानों, नदी-तालाबों को बर्बाद करने की खुली छूट दे दी है।

शासन व प्रशासन के सिर पर सवार होकर व्यापरिनुमा नेताओं ने बड़े पैमाने पर आदिवासियों व गरीबों की मौके की जमीन को औने- पौने दाम पर हथिया लिया तथा बाद में अधिग्रहण व मुआवजे की शक्ल में करोड़ों का वारा-न्यारा कर लिया। गरीबों को न तो मुआवजा मिला, न नौकरी मिली और न ही उचित विस्थापन मिला। इस खेल में स्थानीय जनप्रतिनिधि सहित कई पूंजीपति नेताओं के नाम लिये जाते हैं। धरमजयगढ़ के प्रस्तावित कोल ब्लॉकों में आज भी इन सभी की सैकड़ों एकड़ बेनामी जमीन है।

साढ़े आठ सौ करोड़ का एन.टी.पी.सी. मुआवजा घोटाला, तेलाईपाली रेल लाइन मुआवजा घोटाला सहित 194 आबंटन भूमि घोटाला इस अफरा-तफरी के बड़े उदाहरण हैं। छत्तीसगढ़ के एक प्रभावी मंत्री के परिवारजनों द्वारा किये गये कुनकुनी जमीन घोटाले को लेकर सर्व आदिवासी समाज का आंदोलन जारी है। ट्रांसपोर्ट नगर से नंदेली तक निर्माणाधीन राजमार्ग में भी स्थानीय नेतृत्व सहित अन्य प्रमुख भाजपाइयों को करोड़ों का मुआवजा मिलने की भी सरगर्म चर्चा है। औद्योगिकरण का दंश झेलने वाले छँटनी व बेरोजगारी झेलने को विवश हैं और नेताओं ने सात पुश्तों की व्यवस्था कर ली।

ग्रामपंचायत से जिला पंचायत तक, नगर पंचायत से नगर निगम तक और तहसील कार्यालय से जिला कलेक्ट्रेट कार्यालय तक भाजपाई दलालों व भ्रष्टाचारियों का मजबूत जाल फैल चुका है। पूरा सिस्टम इनकी गिरफ्त में है और आम जनता हाशिये पर चली गयी है।

व्यावसायिक नेता मस्त-कार्यकर्ता पस्त:- भाजपा सरकार से जहाँ क्षेत्र की आम जनता का मोहभंग हुआ है वहीं रायगढ़ में भाजपा कार्यकर्ताओं का भी मोहभंग भी हुआ है। पार्टी में खरसिया व रायगढ़ के थैलीशाहों व नवधनाढ्यों के एकतरफा वर्चस्व के कारण पार्टी के साथ वर्षों से जुड़े मध्यम व निम्न वर्ग के कार्यकर्ताओं की स्थिति दयनीय होती हो गयी है। वस्तुतः रायगढ़ में भाजपा ठेकेदारों, बिल्डरों, भूमि व कोल माफियाओं, रेत व डोलोमाइट तस्करों, बड़े ट्रांसपोर्टरों, सप्लायरों व इनके द्वारा पोषित बाहुबलियों की पार्टी बनकर रह गयी है। इन व्यावसायी नेताओं ने पार्टी के लिये वर्षों से खून पसीना एक करने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं कोने में दुबक कर बैठने के लिये मजबूर कर दिया है। रायगढ़ में तो रोज की डांट-डपट और बात-बात पर कार्यकर्ता का अपमान स्थानीय नेतृत्व का चलन बन गया है।

किसी समय भाजपा रूपी पौधे को लगाने हेतु केवल मुट्ठीभर खाक डालने वाले व्यवसायी नेता भी आज सत्तारूपी कल्पवृक्ष को अपनी निजी मिल्कियत की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं तथा इस कल्पवृक्ष से गिरने वाली अशर्फियों को ‘अंधा बाँटे रेवड़ी चिन्ह-चिन्ह कर देय’ की तर्ज पर अपने रिश्तेदारों व मुँह लगे चाटुकारों के बीच बाँट रहे हैं। पार्टी के विधायक व सांसद पार्टी व शासन के छोटे-बड़े पदों पर पुराने व समर्पित कार्यकर्ताओं की जगह सत्ता के समय कमाने-खाने की नियत से पार्टी में आने वाले नये व स्वार्थी जी-हूजीरियों को धड़ल्ले से बिठा रहे हैं और कोई पूछने वाला नहीं है।

पूरे संगठन पर खरसिया व रायगढ़ के पूंजीपतियों के इस वर्चस्ववादी कब्जे से पार्टी में अन्य वर्गों के कार्यकर्ताओं में बेहद नाराजगी व बेचैनी देखी जा रही है। खरसिया विधानसभा तो इसी व्यावसायिक वर्चस्ववादी राजनीति के कारण भाजपा कभी नहीं जीत पायी। इधर सन 2008 के चुनाव में इस फैक्टर के कारण रायगढ़ विधानसभा में भी भाजपा को पराजय का मुँह देखना पड़ा था। इस बार यह खतरा पहले की तुलना में अधिक प्रभावी रूप में आसन्न है।

बदलना होगा तालाब का पानी :- डॉ.साहब, विकास योजनाओं को जनहित में संचालित करना हर सरकार का उद्देश्य होता है। दुर्भाग्य से रायगढ़ के नये नेतृत्वकर्ताओं ने विकास योजनाओं को अपने आर्थिक एवं व्यावसायिक हित साधने का माध्यम बना लिया है फलस्वरूप यहाँ विकास प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस वास्तविकता को छिपाने हेतु आपके जनप्रतिनिधि घर-घर घूमने एवं अभियानों की राजनीति का सहारा ले रहे हैं। इस कोरी व निरर्थक सक्रियता को कर्मठता व जनता हेतु किये जाने वाले त्याग व तपस्या की तरह प्रचारित करके जनता और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की आँखों में धूल झोंकने की कोशिश की जा रही है।

ग़ौरतलब यह है कि रायगढ़ विधानसभा में आपके नुमाइंदे की बदमिजाजी व खराब व्यवहार के जितने किस्से सामने आये हैं और एक जनप्रतिनिधि का जितना तेज व्यक्तिगत विरोध देखने को मिल रहा है, सार्वजनिक जीवन में ऐसे उदाहरण शायद ही कहीं देखने- सुनने को मिलेगा। अब तो प्रत्याशी बदलने की मांग भी भीतर और बाहर दोनों जगह जोर पकड़ने लगी है।

अतः डॉ.साहब , रायगढ़ के संदर्भ में “विकास यात्रा” की नहीं “विवेचना यात्रा” की जरूरत है ताकि आपको स्पष्ट हो सके कि आपके व्यावसायिक जनप्रतिनिधियों के घर का किस बड़े पैमाने में निजी विकास हुआ है और आम जनता की चौखट तक पहुंचने से पहले विकास ने किस तरह बीच रास्ते में ही दम तोड़ दिया है। समय रहते यदि यह विवेचना नहीं की गयी तो आगामी चुनाव में रायगढ़ में कमल के खिलने को लेकर आपको अधिक आशावादी नहीं होना चाहिये।

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