संपादकीय

लेख : डॉ. राजू पाण्डेय – “बुद्धिजीवियों के सम्मुख अपना धर्म निभाने की चुनौती”

बहुधर्मी और बहुजातीय देश में लोक तंत्र को कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। ऐसी ही एक परीक्षा का प्रारंभ उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद हुआ है। देश की स्वतंत्रता के जश्न ने दो निहायत ही तकलीफदेह विसंगतियों से उपजी पीड़ापूर्ण कराहों को अनसुना कर दिया। पहली थी धर्म के आधार पर देश का विभाजन और उसके बाद भड़की हिंसा और दंगों की विभीषिका ( जिसने देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा तथा साम्प्रदायिक सौहार्द पर स्थाई खतरे का रूप ले लिया) और दूसरी थी भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा गलत समझे गए, सबसे ज्यादा उपेक्षित और गलत ढंग से उपयोग होने वाले अनूठे राष्ट्रवादी विलक्षण अंतर्दृष्टि युक्त बाबा साहब अंबेडकर की चेतावनियों को अनसुना करने की आत्मश्लाघात्मक प्रवृत्ति। महात्मा गाँधी और पंडित नेहरू के विराट व्यक्तित्व के कवच ने उन असंतुष्ट स्वरों,आंदोलनों और नेताओं को इस प्रकार आच्छादित कर लिया जो हिंदुत्व तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के महत्व और जातिभेद की विसंगतियों की ओर ध्यानाकर्षण करना चाहते थे कि ऊपर से देश का सेक्युलर और जातिवाद से मुक्ति पाता स्वरूप देश का मूल और मजबूत ढांचा लगने लगा। किन्तु इन महापुरुषों के अवसान के बाद समय के साथ जब इनके प्रभाव का यह कवच धीरे धीरे जीर्ण हुआ तो दिखने लगा कि धर्म और जाति तथा राष्ट्रवाद की अवधारणाओं को संकीर्ण या पश्चगामी कहकर उन्हें ख़ारिज करने की भूल ने इनके समर्थकों को न केवल नई ऊर्जा और संकल्प प्रदान किया था अपितु जन मानस भी शनैः शनैः इनके प्रति सहानुभूतिजन्य आकर्षण दर्शाने लगा था।विडंबना यह भी है कि अल्पसंख्यक और दलित जिन्हें केंद्र में रखकर इनके तुष्टिकरण के आरोप कांग्रेस ने झेले वे भी न तो विकसित हो पाए और न ही संतुष्ट। हाँ बहुसंख्यक हिन्दू धर्मावलंबियों और अगड़ी जातियों में धीरे-धीरे यह धारणा पनपने लगी कि उनकी वर्तमान पीढ़ी उन अपराधों का दंड भोग रही है जो उन्होंने किए ही नहीं हैं।जबकि यह भी आरोप इन पर लगे कि सत्ता पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए इन्होंने दलित-मुस्लिम कार्ड का बखूबी इस्तेमाल किया।

धर्म से अपरिहार्य रूप से जुड़े जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अब देश की भावी राजनीति का निर्णायक तत्व माना जा रहा है उसके अनेक प्रारूप भाजपा के पास मौजूद हैं जिनका यथा सुविधा इस्तेमाल करने के विकल्प उसके पास खुले हैं। लोकमान्य तिलक ने हिन्दू शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा- वे सभी लोग हिन्दू हैं जो वेदों का प्रामाण्य मानते हैं, भले ही उनके उपास्य अलग-अलग हों। इस परिभाषा ने जैन एवं बौद्ध आदि धर्मों को हिन्दू धर्म से अलग कर दिया। स्वयं को नास्तिक कहने वाले सावरकर ने हिन्दू को परिभाषित करते हुए कहा कि वे समस्त लोग हिन्दू हैं जो सिंधु नदी से सागर तक फैले हुए भारत को अपनी पुण्य भूमि एवं पितृ भूमि मानते हैं। यह परिभाषा पारसी, मुस्लिम एवं ईसाई धर्मावलंबियों को समाविष्ट नहीं कर सकती।राष्ट्रवाद के इससे थोड़े व्यापक पाठ का आभास गोलवलकर के विचारों में मिलता है। उनके अनुसार वे सभी लोग हिन्दू हैं जो भारत को अपनी माता मानते हैं,भारत की संस्कृति एवं अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान का भाव रखते है, भले ही उनके धर्म और तीर्थ अलग क्यों न हों।

गोलवलकर का राष्ट्रवाद फ्रांसीसी विचारक अर्नेस्ट रेनां के विचारों से गहरी समानता दर्शाता है जो राष्ट्र को आध्यात्मिक अवधारणा मानते हैं।गोलवलकर स्टेट और नेशन में अंतर करते हुए बताते हैं राज्य की शक्ति कानून का भय है बल्कि राज्य तो क़ानून ही है जबकि राष्ट्र लोगों की मानसिकता एवं भावना की सृष्टि होता है- People are the nation- गोलवलकर को अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। गोलवलकर स्टॅलिन को उद्धृत करते हैं- एक भू प्रदेश में रहने वाले जनों के केवल राजनीतिक एवं आर्थिक हित समान रहने से राष्ट्र नहीं बन जाता, राष्ट्र तो अभौतिक भावनाओं की सजातीयता है। गोलवलकर के अनुसार राष्ट्रवाद तीन मूलभूत आधारों पर टिका होता है पहला आधार है जिस देश में लोग रहते हैं उस भूमि के प्रति लोगों की भावना, द्वितीय आधार है इतिहास में घटित घटनाओं के प्रति समान प्रतिक्रिया- समान रूप से हर्ष और विषाद तथा आनंद एवं दुःख व्यक्त करना एवं तीसरा और सर्वाधिक महत्वपूर्ण आधार है समान संस्कृति। यहाँ यह जिक्र करना आवश्यक हो जाता है कि अम्बेडकर की राष्ट्रवाद की परिकल्पना अर्नेस्ट रेनां की परिभाषा पर ही आधारित है किंतु उनके राष्ट्र की अवधारणा की जड़ें बौद्ध धर्म में भी फ़ैली हुई हैं जो इसे पाश्चात्य बनने से रोकती हैं। लेकिन यह एक समानता अम्बेडकर को सावरकर और गोलवलकर के साथ खड़ा करने हेतु पर्याप्त नहीं है। अम्बेडकर जाति को राष्ट्र का शत्रु मानते हैं और उनकी दृढ़ मान्यता है कि भयंकर जातिगत विषमता का अस्तित्व भारत को एक राष्ट्र बनने से रोकता है। जबकि सावरकर और गोलवलकर मनु स्मृति एवं चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था को एक ऐतिहासिक आवश्यकता मानते हैं। यद्यपि अस्पृश्यता एवं छूआछूत का विरोध गाँधी जी की ही भांति इन दोनों ने भी बड़ी प्रबलता से किया। सावरकर और गोलवलकर दोनों ही गाँधी जी द्वारा हरिजन शब्द के प्रयोग के विरोधी रहे और इस प्रकार के शब्द प्रयोग को अस्पृश्यता मिटाने के बजाए उसे रेखांकित कर ध्यानाकर्षण का केंद्र बनाने वाला मानते रहे।

सावरकर ने सेल्युलर जेल से दिनांक 9 मार्च 1915, 6 जुलाई 1916 एवं 6 जुलाई 1920 को लिखे अपने पत्रों में अस्पृश्यता का घोर विरोध किया – हमारी सामाजिक संस्थाओं में सबसे निकृष्ट संस्था है जाति। जाति-पांति हिंदुस्थान का सबसे बड़ा अभिशाप है। यह कहना कोई अर्थ नहीं रखता कि हम जातियों को घटा कर चातुर्वर्ण्य की स्थापना करेंगे। यह न होगा न होना चाहिए।इस पाप को जड़ मूल से नष्ट कर डालना चाहिए। मैं उस समय को देखने का अभिलाषी हूँ जब हिंदुओं में अंतर्जातीय विवाह होने लगेंगे एवं पंथों और जातियों की सीमाएँ टूट जाएंगी।मैंने हिदुस्थान की जाति पद्धति और अछूत पद्धति का उतना ही विरोध किया है जितना बाहर रहकर भारत पर शासन करने वाले विदेशियों का। सावरकर की प्रेरणा से भागोजी द्वारा निर्मित पतित पावन मंदिर भी अछूतोद्धार की दिशा में किया गया एक प्रयास था। गोलवलकर के जाति संबंधी विचार पारंपरिकता के अधिक निकट थे। गोलवलकर जाति व्यवस्था को नेशनल इंश्योरैंस स्कीम विदआउट गवर्नमेंटल इंटरफेरेंस मानते थे। वे कहते हैं- आजकल जाति व्यवस्था टूट जाने से यह सोशल इंश्योरैंस स्कीम भी खत्म हो गई है। अपने यहाँ कास्ट रिडन सोसाइटी है ऐसा कहा जाता है किंतु ऐसा दिखता तो नहीं। यहाँ की व्यवस्था में धंधा खोजने की या योर मोस्ट ओबीडीएन्ट सर्वेंट बनकर द्वार द्वार नौकरी खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। अपने जन्मसिद्ध व्यवसाय से परिवार का पोषण करना एवं आनंद से शांत चित्त होकर परम तत्व का चिंतन और आह्वान करना यह हो सकता था। बड़े बड़े प्रगतिशील देशों में ऐसी सामाजिक रचना नहीं है। गोलवलकर हमें बार बार जातिप्रथा एवं जातिभेद में अंतर करने के लिए सतर्क करते हैं। गोलवलकर उस समय अम्बेडकर से बिलकुल दूसरे ध्रुव पर खड़े नजर आते हैं जब वे कहते हैं कि- वर्तमान काल में हमारी समाज व्यवस्था का अधोमुखी विपर्यस्त स्वरुप देखकर तथा गलती से उसे ही हमारे समाज का मूल स्वरूप समझ कर कुछ लोग यह प्रचार करते थकते नहीं कि इतनी शताब्दियों से हमारे पतन के मूल में यह वर्ण व्यवस्था ही है। किन्तु क्या यह व्याख्या इतिहास सिद्ध हो सकती है? जातियाँ तो उस प्राचीन काल में भी थीं और हमारे वैभवशाली राष्ट्र जीवन के सहस्र वर्ष में बराबर रही हैं। कहीं एक भी उदाहरण नहीं है कि उन्होंने हमारे समाज की एकता और प्रगति में बाधा डाली हो।

गत एक सहस्त्र वर्षों में जब हमारा राष्ट्र विदेशियों के आक्रमण का शिकार बना, एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिलता जिससे यह सिद्ध हो सके कि हमारे राष्ट्र की जिस फूट ने विदेशी आक्रमणकारियों की सहायता की उसके मूल में यह जातिभेद थे। राष्ट्रीय भावना का अभाव हमारी पराजय का एक कारण रहा, जब देश का एक भाग आक्रांताओं से संघर्ष कर रहा था तो दूसरा भाग या तो तटस्थ था या आक्रांताओं का साथ दे रहा था। हमारी एक कमी यह रही कि हम विजय का महत्व नहीं समझ पाए। गोलवलकर के मतानुसार- न हम जाति प्रथा के पक्ष में हैं और न उसके विरोधक हैं। उसके बारे में हम इतना ही जानते हैं कि संकट के कालखंड में वह बहुत उपयोगी सिद्ध हुई थी और यदि आज समाज उसकी आवश्यकता अनुभव नहीं करता तो वह स्वयं समाप्त हो जायेगी। उसके लिए किसी को दुःखी होने का कोई कारण नहीं। अस्पृश्यता सवर्णों की संकुचित मनोभावना का नामकरण है। जो अस्पृश्यता को मानते हैं वे धर्माचार्यों को भी मानते हैं अतः धर्माचार्यों के माध्यम से इसका समाधान सम्भव है। संघ प्रचारक माधव गोविन्द वैद्य बताते हैं कि 1969 में विश्व हिंदू परिषद के सम्मेलन में गोलवलकर के प्रयासों से चारों शंकराचार्यों को एक मंच पर लाकर उनसे दो महत्वपूर्ण घोषणाएँ कराई गईं एक तो- हिन्दवः सोदराः सर्वे। जिससे अस्पृश्यता उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त हुआ। और दूसरी थी- न हिंदुः पतितो भवेत् – जिसने धर्मान्तरण का रास्ता खोला।
कुछ बातें और भी हैं जिनकी ओर वामपंथी विचारकों ने ध्यानाकर्षण किया है- संघ के पूज्य और पुरोधाओं के लिए हिटलर एवं मुसोलनी घृणा के पात्र तो कदापि नहीं थे। वामपंथ से इनका स्वाभाविक मतभेद था। वर्ण व्यवस्था को ये हिन्दू नस्ल की रक्त शुद्धता का श्रेय देते थे। वामपंथियों के मतानुसार छूआछूत समाप्त करने के इनके प्रयास या तो धर्मान्तरण के खतरे से मुकाबला करने के लिए अपनाई गई रणनीति का हिस्सा थे या सवर्ण नेतृत्व के लिए सेवकों की भीड़ एकत्रित करने की चेष्टा से प्रेरित थे। वाम पंथी विचारकों के मतानुसार सावरकर, हेडगेवार और गोलवलकर का ब्राह्मण होना महज संयोग नहीं था। सावरकर के हिंदुत्व को कुछ विचारक यूरोप से आयातित विचार मानते हैं। हिन्दू शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में उठे अनेकानेक विवादों का समाधान संघ अंत में इस तर्क से देता है कि यह शब्द इस लिए उपयुक्त है क्योंकि इससे जन भावनाएँ जुडी हुई हैं। वामपंथी 1939 में गोलवलकर द्वारा रचित “हम या हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा” से उन्हें उद्धृत करते हैं- हिंदुस्तान में जो विदेशी नस्लें हैं उन्हें हिन्दू संस्कृति और भाषा अपना लेना चाहिए। हिन्दू धर्म का आदर और सम्मान करना सीख लेना चाहिए। हिन्दू नस्ल और संस्कृति के प्रति गौरव रखने के अलावा मन में कोई भी विचार रखना ही नहीं चाहिए। श्री सुदर्शन कहते हैं- इस्लाम ने इंडोनेशिया में मुसलमानों को महाभारत और रामायण को अपने सांस्कृतिक महाकाव्य तथा कृष्ण और राम को अपने पुरखे मानने से नहीं रोका। इधर वामपंथी अम्बेडकर को भी उद्धृत करते हैं- अगर हिन्दू राज सचमुच एक वास्तविकता बन जाता है तो इसमें संदेह नहीं कि यह देश के लिए भयानक विपत्ति होगी। क्योंकि यह स्वाधीनता, समता और बंधुत्व के लिए खतरा है। इस दृष्टि से यह लोक तंत्र से मेल नहीं खाता।इसलिए इसे रोका जाना चाहिए।

किन्तु अम्बेडकर को वामपंथी खांचे में फिट करने की कोशिश भी नाजायज है। अम्बेडकर हमेशा इस बात को लेकर सशंकित रहे कि वामपंथी संविधान एवं संसदीय लोकतंत्र के प्रति कैसी प्रतिक्रिया करेंगे। अम्बेडकर ने एक ऐतिहासिक शोध ग्रन्थ लिखा है- Thoughts on Pakistan( Pakistan or Partition of India) जिसका प्रथम संस्करण 1941 में तथा द्वितीय संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण 1945 में प्रकाशित हुआ। यह एक शोध ग्रन्थ है और 5 भागों में विभक्त है- मुस्लिम केस फॉर पाकिस्तान, हिन्दू केस अगेंस्ट पाकिस्तान,व्हाट इफ़ नॉट पाकिस्तान,पाकिस्तान एंड द् मलिस, पाँचवें भाग का कोई शीर्षक नहीं है और यह द्वितीय संस्करण में सम्मिलित है। इस शोध ग्रन्थ का मनचाहा उपयोग विभिन्न विचारधाराओं ने दलितों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए किया है।उत्तर प्रदेश के 2014 के लोकसभा एवं 2017 के विधान सभा चुनावों में दलितों को आकर्षित करने हेतु जमकर इस ग्रंथ को प्रयुक्त किया गया। आने वाली अम्बेडकर जयंती 14 अप्रैल 2017 को इस ग्रन्थ का यदि पुनर्पाठ किया जाए तो यह दलित-मुस्लिम समस्या को समझने की कुंजी का कार्य कर सकता है। अम्बेडकर इस पुस्तक के इंट्रोडक्शन में लिखते हैं-

The British cannot consent to settle power upon an aggressive Hindu majority and make it its heir, leaving it to deal with the minorities at its sweet pleasure. That would not be ending imperialism. It would be creating another imperialism. अम्बेडकर एक अन्य स्थान पर लिखते हैं- What is important to note is that it is the minority nations which have taken the lead in opposing the formation of a communal party. For they know if they form a communal party, the major community will also form a communal party and the majority community will thereby find it easy to establish communal raj. It is vicious method of self protection.
बाबा साहब ने जब 27 सितम्बर 1951 को कानून मंत्री के पद से त्यागपत्र दिया तब उन्होंने सदन में अपने त्याग पत्र पर बोलते हुए कहा-

What is the Scheduled Castes today? So far as I see, it is the same as before. The same old tyranny, the same old oppression, the same old discrimination which existed before, exists now, and perhaps in a worst form. I can refer to hundred of cases where people from the Scheduled Casts round about Delhi and adjoining places have come to me with their tales of woes against the Caste Hindus and against the Police who have refused to register their complaints and render them any help. I have been wondering whether there is any other parallel in the world to the condition of Scheduled Castes in India. I cannot find any. And yet why is no relief granted to the Scheduled Castes? Compare the concern the Government shows over safeguarding the Muslims. The Prime Minister’s whole time and attention is devoted for the protection of the Muslims. I yield to none, not even to the Prime Minister, in my desire to give the Muslims of India the utmost protection wherever and whenever they stand in need of it. But what I want to know is, are the Muslims the only people who need protection? Are the Scheduled Castes, Scheduled Tribes and the Indian Christians not in need of protection? What concern has he shown for these communities? So far as I know, none and yet these are the communities which need far more care and attention than the Muslims.
स्वतंत्रता के बाद जिस सेक्युलरवाद के आवरण से हमारे देश का अंतरंग ढका हुआ था उसके भीतर धार्मिक अस्मिता की बढ़ती आकांक्षाएं और जातीय पहचान की उत्कट अभिलाषा छिपी हुई थीं। स्वातंत्रोत्तर काल में भारतीय आंतरिक राजनीति का एक प्रस्थान बिंदु तब आया जब मंडल कमीशन की सिफारिशों के एक भाग को लागू करने का निर्णय किया गया। इसके साथ ही उग्र जातिवाद पर आधारित क्षेत्रीय दलों के युग का प्रारंभ हुआ और कांग्रेस जैसी पार्टी की सर्वसमावेशी छवि खंडित हुई। इस जाति वादी जन उभार को प्रगतिशील एवं क्रांतिकारी मानने की गलती कोई भी बड़ी आसानी से कर सकता था क्योंकि इसका परिणाम शोषक वर्ग से शोषित वर्ग को सत्ता का हस्तांतरण था।किन्तु विचारधारात्मक आधार के अभाव में यह प्रतिशोधात्मक बन गया एवं शोषकों तथा शोषितों की जाति बदलने का माध्यम बनकर रह गया।

भारतीय प्रजातंत्र का दूसरा प्रस्थान बिंदु बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे का विध्वंस था। यह मुद्दा आरोपित था, भरमाने और भटकाने वाला था इस प्रकार की ढेरों व्याख्याएं विमर्श में उपस्थित हैं किन्तु ये स्वयं को लगे शॉक को सहन करने की शक्ति देने की विधियों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं। सच्चाई तो यह है कि भाजपा का अभ्युदय इसके बाद हुआ और थोड़े बहुत उतार चढ़ाव के साथ उसकी शक्ति निरंतर बढ़ती चली गई। धर्म और जाति की राजनीति को प्रतिगामी कहकर उसके महत्व को कम आँकना सत्य से मुँह मोड़ना है। कोरे आदर्शवाद से राजनीति नहीं चलती। उत्तर प्रदेश के चुनाव भारतीय राजनीति के तीसरे प्रस्थान बिंदु की ओर संकेत कर रहे हैं। यह ऐसा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है जिसके साथ धार्मिक पहचान अपरिहार्य रूप से जुड़ी हुई है। भारतीय राजनीति धर्म और संस्कृति की नई व्याख्याएँ तलाश रही है, समय किंकर्तव्यविमूढ़ होने का नहीं है बल्कि कर्म करने का है।

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